June 27, 2022

Mithila Mail

मिथिलाक न्यूज मैथिली मे

मजदूर दिवस विशेष : लहलहाइत खेत, हँसैत फुलबाड़ी आ भरल थारी सब मजदूरे के कमाल

  • रमण कुमार सिंह

अंग्रेजीक कवि, नाटककार आ अभिनेता विलियम शेक्सपियर कहने छथिन जे ई दुनिया रंगमंच अछि आ सभ स्त्री-पुरुष एकर पात्र अछि। मुदा हमरा बुझाइत अछि, जे ई दुनिया एकटा विशालकाय कर्मक्षेत्र अछि आ हम सब एतय काज करै बला मजूर यानी श्रमिक थिकहुं। गीता मे श्रीकृष्ण कर्मक प्रधानता कें रेखांकित करैत कहने छथिन, जे ज्ञान-योगी सेहो अपन अंतःकरणक पवित्रता लेल निष्काम कर्मयोगक आचरण करैत अछि। संन्यास कर्मक परित्याग नहि थिक, अपितु फल आ आसक्तिक परित्याग करि कर्तव्यक पालने वास्तविक संन्यास थिक। रामचरित मानस मे तुलसीदास सेहो कर्मक प्रधानता कें स्वीकार कयने छथि-‘करम प्रधान विश्व रचि राखा। जो जस करइ सो तस फल चाखा।।’ तें हमर मानब थिक जे हम सब अपन-अपन कर्तव्यक पालन करै बला श्रमिक अथवा मजूर थिकहुं। ई फराक बात थिक जे केओ शारीरिक श्रम करैत अछि, केओ मानसिक श्रम। हालांकि शारीरिक श्रम कें समाज मे कम महत्व देल जाइत छैक आ बौद्धिक अथवा मानसिक श्रम कें बेसी महत्व देल जाइत छैक, मुदा हमर मानब थिक जे शारीरिक श्रम केनिहार मजूर लोकनि मानसिक श्रम केनिहार सं किन्नहुं कमतर नहि होइत छथि। ई पूंजीवादी बुर्जुआ तंत्र अछि, जे दुनू मे विभेद कयने अछि आ एकर प्रतिफल ई थिक शारीरिक श्रम केनिहार मजूर वर्ग कें ओकर वास्तविक पारिश्रमिक अथवा मानदेय नहि भेटैत अछि।

हर जोतय बला, खेत मे मजदूरी करै बला, फैक्टरी मे काज करै बला, लकड़ी सँ विभिन्न तरहक टेबुल, कुर्सी, चौकी, हर इत्यादि बनबै बला, लोहा सँ विभिन्न तरहक उपकरण बनबै बला, हस्तशिल्प केर कागज करै बला, माटि-गारा उघै बला, राजमिस्तरी के काज करै बला, किताब छापै बला मशीन पर काज करै बला, फिलिम सेट पर स्पॉट बॉय आ एक्स्ट्रा कलाकारक रूप मे काज करै बला, विभिन्न कार्यालय मे फाइल एम्हर सँ ओम्हर उघै बला, पानि पियाबै बला आदि सब मजदूर अछि। हमरा सन कलम घिसै बला, ठेका पर धिया-पुता कें पढ़बै बला, आदि सब मजदूर अछि। एहि मे सँ किछु लोग नियोजित क्षेत्र मे काज करैत अछि आ किछु लोग अनियोजित क्षेत्र मे। नियोजित क्षेत्र मे भारतीय श्रमबल केर बहुत छोट हिस्सा काज करैत अछि, जेकरा पीएफ, ग्रेच्यूटी, बीमा, बोनस आदि सन किछु सामाजिक सुरक्षा भेटैत छैक। मुदा अधिकांश मजूर अनियोजित अथवा असंगठित क्षेत्र मे काज करैत अछि, जेकरा कोनो तरहक सामाजिक सुरक्षा नहि भेटैत छैक।

आर तँ आर, हमरा सभक घर मे जे माइ, बहिन, बेटी, पीसी आदि स्त्रिगण जे श्रम करैत अछि, की ओकर कोनो गिनती हम सब श्रम मे करैत छी। हम पुरुष लोकनि अपन-अपन काज करि जखन सांझ मे घर घुरैत छी, तँ ई अपेक्षा रहैत अछि, जे घर पर रहै बाली स्त्रिगण पानि,चाय, जलखै सँ हमर स्वागत करय। मुदा ओ सभ जे भरि दिन हमरा सभक गृहस्थी कें सम्हारैत खटैत रहैत अछि आ धिया-पुता सँ ल’ क’ बूढ़-पुरनिया लोकक देखभाल करैत अछि आ सबहक हारी-बेमारी मे बेहाल रहैत अछि। ओकर श्रमक मोल चुकायब तँ दूरक गप, ओकर श्रम कें तँ श्रम मानलो नहि जाइत अछि। कखनौ काल हम सोचैत छी, जे ई दुनिया की कहियो एहिन लोकक श्रम आ समर्पण केर मोल चुका सकैत छैक। हमरा बुझने तँ नहि। बाहरो सँ हम सब जाहि मजदूर लोकनि सँ काज कराबै छी आ  काजक बदला ओकरा जे मजूरी दैत छियैक, ओहो पर्याप्त नहि होइत छैक। कियैक तँ हम सभ जे मजदूरी दैत छियै, ओ तँ भेलै ओकर श्रमक मोल, मुदा जाहि समर्पणक संग, जाहि लगन सं ओ काज करैत अछि, की ओकर पैसा सँ मोल चुकाएल जा सकै छै? ओकर मोल तँ प्रेमे सँ चुकाएल जा सकैए।

काल मार्क्स मजदूरक शोषण कें देखैत दुनिया भरि केर मजदूर कें संगठित हेबाक आह्वान कयने रहथि। तहिया सँ दुनिया परिवर्तनक अनेक चक्र सँ गुजरल अछि। मजदूरक जीवन मे सेहो अनेक तरहक बदलाव आयल अछि, मुदा एखनो विभिन्न स्तर पर ओकर शोषण के प्रक्रिया रुकल नहि अछि। दुनिया भरि मे मजदूरक कल्याण लेल मजदूर संगठन बनल आ अपनो देश मे मजदर संगठन बनल। मुदा मजदूर संगठन मे जे दलाल प्रवृत्तिक लोकक घुसपैठ भेल, ओ शोषक पूंजीवादी व्यवस्थाक संग मिलकें सरल, सामान्य हृदय बला मजदूरक संग छल केलक, जकर परिणाम ई भेलै जे मजदूर संगठनक प्रति श्रमिक लोकनिक भरोसा टूटि गेलैक आ ओ फेर असंगठित भ शोषणक चक्की मे पिसाइ लेल मजबूर अछि। अपना देश मे 1948 मे न्यूनतम वेतन के कानून पारित भेल, मुदा कतेक मजदूर कें न्यूनतम वेतन भेटैत छैक। एतय तँ रोजगार भेटै पर आफत छैक, तखन न्यूनतम मजूरीक शर्तक पालन के तँ बाते दूर अछि। भारत मे निजी क्षेत्र मे तँ मजूरक शोषण होइते अछि, सरकारी क्षेत्र मे ठेकेदारी प्रथा शुरू भेला सँ सेहो शोषणक एकटा नव चक्र शुरू भ गेल अछि।

अत्यधिक उत्पादन करि मुनाफा कमबै के होड़ मे मशीनीकरण केर प्रक्रिया शुरू भेल। मशीनीकरण सँ हाथक काज घटि गेल, फलतः मजदूर लोकनि कम मजदूरी मे काज करै खातिर मजबूर भेल। मुदा जेहन काज मनुक्खक हाथ सँ होइत छल, की मशीन ओहन सुघड़ काज करि सकैए। मनुक्खक हाथक काज मे आत्मिक पवित्रता होइत छैक, ओ मशीनी काज मे कतय। ओनाहितो बहुत रास काज एहन अछि, जे मशीन नहि करि सकै अछि, ओ काज मनुक्खे करि सकैत अछि। जहां काम आबै सुइ कहां करै तलवार। मुदा आब तँ ऑटोमेशन के जमाना शुरू भ’ गेल अछि, जाहि सँ मजदूर वर्गक छंटनी बढ़ि गेल अछि।

पहाड़ी क्षेत्रक मादे कहल जाइत रहै, जे पहाड़क पानी आ पहाड़क जवानी ओकर काज नहि अबैत छैक। मुदा एहन तरहक समस्या सँ आइ मिथिला क्षेत्र सेहो जूझि रहल अछि। मिथिलाक पानि केर ठीक सं प्रबंधन नहि भेलाक कारण ई एतय बाढ़िक चलते जनधनक नोकसानक कारण बनल अछि। आ मिथिलाक युवा लोकनिक पलायन जग जाहिर अछि। मिथिलाक क्षेत्र देश आ दुनियाक लेल श्रमिकक एकटा प्रमुख स्रोत बनल अछि। मुदा मिथिला मे किसान कें खेती लेल बेर पर मजदूर नहि भेटैत अछि। आखिर एकर की कारण अछि​? एकर मुख्य कारण तँ ई अछि जे एखनो मिथिला समाज मे किछु हद तक सामंती व्यवस्थाक अवशेष बांचल अछि। जमाना बदलि गेल अछि, मुदा जमींदार लोकनिक ठेसी आ शोषणक प्रवृत्ति मे कमी नहि आयल अछि। ऊपर सँ श्रम आ श्रमिकक प्रति सम्मानक बदला उपेक्षा आ गारि-फज्जतिक सामंती रेवाज। मैथिली साहित्य मे धीरेंद्र केर ‘भोरुकवा’, ललित केर ‘पृथ्वी पुत्र’, मायानंद मिश्रक ‘खोंता आ चिड़ै’ आ एकदम युवतर पीढ़ीक कथालेखिका अभिलाषाक कथा ‘खखास’ मे श्रमिक जनक शोषणक विभिन्न छवि देखार दैत अछि। आनो रचनाकार लोकनिक कथा-उपन्यास-कविता आदि मे श्रमिक दशा-दिशाक वर्णन भेल अछि, जिनका सभक नाम एखन स्मरण नहि अबैत अछि।

यैह कारण अछि जे मिथिलाक गामक गाम खाली भ’ गेल अछि। वैह श्रमिक शहर-महानगर मे आबि बहुत संकटपूर्ण स्थिति मे रोजी-रोटी कमबैत अछि। शहर आ महानगर एहि श्रमिक वर्गक कारणें दिन-दुनी राति चौगुनी प्रगति करैत अछि, मुदा एहि श्रमिकक कोनो सम्मान नहि करैत अछि। जौं श्रमिक वर्गक प्रति थोड़बो करुणा आ संवेदना शहर-महानगर कें रहितै, तँ महामारीक भयावह समय मे मजदूर सभ भूखल-पियासल अपन जान पर खेल कें हजारो किलोमीटर के पैदल यात्रा करि अपन गाम-घर नहि घुरितै। ओ दृश्य कोनो संवेदनशील व्यक्ति कें सिहराय दैत अछि। हमरा लगैत अछि, जे मजदूर लोकनिक स्थिति ओहि बेटी जकां अछि जेकरा मादे मिथिला मे एकटा कहबी अछि जे, नैहरा जो बेटी ससुरा जो, हाथ डोला बेटी कतहु खो।

कहबाक तात्पर्य ई जे मजदूरक प्रति कतहु कोनो करुणा, संवेदना आ सम्मानक भाव नहि देखाइत अछि, मुदा मजदूर सभ अछि, जे हर तरहक कष्ट, असुविधा सहैत एहि दुनिया कें, एहि देश कें, एहि समाज कें सुंदर बनबै मे लागल रहैत अछि। एकटा जापानी तत्वज्ञानीक कहब रहै जे ‘हमरा सभक दस करोड़ आंगुरे सभटा काज करैत अछि, ओहि आंगुरक बल पर ई संभव अछि जे हम जगत कें जीत ली।’ जाहि देश आ समाज मे मजदूर, किसान, शिल्पकार, हस्तशिल्पी, मूर्तिकार, चित्रकार आदि मानवीय श्रम करैबला भूखल मरैत छैक, जतय श्रमिक कें सम्मान आ मजदूरी नहि भेटटैत छैक, ओतय अहां कतबो देवी-देवताक पूजा करि लिय’, ओ समाज, ओ देश कहियो सुखी नहि भ’ पबैत छैक। मजदूर सुखी, तखने देश आ समाज सुखी।

मजदूरक श्रम मे ओ क्षमता होइ छै, जे ओ जड़ पदार्थ सँ एकटा जीवंत इमारत, फैक्टरी ठाढ़ क’ सकैत अछि। कोनो देश आ समाजक प्रगति ओतुक्का कार्यबल पर निर्भर करैत छैक। लहलहाइत खेत, हँसैत फुलबाड़ी आ भरल थारी- ई सब मजदूरे के कमाल अछि। मेहनत-मजदूरीक कमाई न नै खाली बरक्कत होइ छै, अपितु आत्मा सेहो पवित्र होइ छै। तें मजदूरों कें अपन काजक प्रति ईमनदार आ प्रतिबद्ध हेबाक चाही।

 

 5,016 total views

Advertisement
Spread the love